सुप्रीम कोर्ट का विवाह के पश्चात अपने पति-पत्नी द्वारा अवैध संबंध रखने का फैसला वैदिक संस्कृति के विरुद्ध

स्वामी राम स्वरूप, योगाचार्य, वेद मंदिर, योल (हि.प्र.)

सुप्रीम कोर्ट के गुरुवार को एक फैसले में 158 साल पुरानी पुरानी धारा 497 असंवैधानिक बताते हुए विवाह के पश्चात पति-पत्नी द्वारा अवैध संबंध बनाने को अपराध की श्रेणी से बाहर कर दिया है | ऐसे आश्चर्यजनक एवं वेद विरुद्ध निर्णय को सुनकर सनातन वैदिक संस्कृति के ज्ञाता विद्वान सचमुच  सिहर गए होंगे | इस निर्णय को सुनकर महिला आयोग प्रमुख स्वाति मालीवाल जी ने सत्य ही कहा कि इससे देश में महिलाओं की पीड़ा बढ़ जाएगी तथा लोगों को शादी-शुदा रहते हुए अवैध संबंध बनाने का स्पष्ट प्रमाण पत्र मिल जाएगा | कहावत है कि यदि आप किसी देश को नष्ट करना चाहते हो तो उस देश की संस्कृति को नष्ट कर दो, देश स्वयं ही नष्ट हो जाएगा |

हम 800 वर्ष मुगलों के तथा 200 वर्ष अंग्रेजों के गुलाम रहे, इस बीच हमारी वैदिक संस्कृति पर अत्याधिक कुठाराघात हुआ है जिस कारण हमारे भोजन रहन-सहन बोल-चाल, वस्त्र पहनने तथा व्यवहार आदि सभी में पश्चिमी देशों की झलक दिखाई देने लगी है| जहां वाल्मीकि रामायण दर्शाती है कि रावण की बहन शूर्पनखा के बुरे विचारों को देखकर श्री राम ने लक्ष्मण द्वारा शूर्पनखा की नाक कटवा दी थी तथा महाभारत काल में कीचक ने द्रोपदी पर विषय-विकारी दृष्टि डाली, तब भीम ने उसे उसी समय प्राण दंड दे दिया, वहां ऐसी पवित्र भारत भूमि पर उक्त निर्णय संस्कृति का विनाश करके देश का विनाश करता दिखाई दे रहा है |

भारतवर्ष की पुरातन-सनातन संस्कृति ईश्वर से उत्पन्न चारों वेद हैं | पुरातन एवं वर्तमान के ऋषि-मुनियों ने भी वैदिक आधार पर अपने ऋषि-प्रणीत ग्रंथों में यह सिद्ध किया है कि मनुष्य धर्म का आचरण करे और धर्म के विषय में स्पष्ट करते हुए उन्होंने कहा है कि जो-जो शुभ कर्म करने की प्रेरणा वेदों ने दी है, उन्हें करना धर्म है और उसके विपरीत कर्म करना अधर्म-पाप है | अतः माननीय सुप्रीम कोर्ट का उक्त निर्णय पूर्णत: वेद विरुद्ध है | यजुर्वेद मंत्र 8/3 के अनुसार जो प्रमादी पुरुष विवाहित स्त्री को छोड़कर परस्त्री का सेवन करता है, वह इस लोक और परलोक में दुर्भागी होता है | इसी प्रकार नारी के विषय में कहा है | अथर्ववेद मंत्र 7/37/1 का भाव है कि पति केवल एक पत्नी का ही बनकर रहे | पति का ध्यान परस्त्री की ओर न जाए |

ऋग्वेद मंत्र 10 /85/14 का भाव है कि समाज को अच्छी, गुणवान संतान देने के उद्देश्य से ही विवाह किया जाता है |

अथर्ववेद मंत्र 6/81/1 में कहा है कि पति का हृदय राक्षसी भावों से शून्य हो, विषय-विकारी ना हो |

ऋग्वेद मंत्र 6/44/23 के अनुसार जो पति अपनी एक विवाहित स्त्री के ग्रहण रूप व्रत धारी है, वेद मार्ग पर चलता है, वह सूर्य के समान तेजस्वी और गुण प्रकाशक तथा यथार्थ वक्ता कहा है |

ऋग्वेद मंत्र 6/64/2 का उपदेश है कि नारी अति विषयासक्ति को छोड़ कर सदैव पुरुषार्थ से धर्मयुक्त कर्म करे |

ऋग्वेद मंत्र 6/65/3 का भाव है कि सभी पुरुष अपनी-अपनी प्रिया भार्या को ही ग्रहण करें, अन्य को नहीं |

अथर्ववेद मंत्र 5/25/6 में कहा है कि पति का मुख्य गुण पाप-निवृत्त जीवन व्यतीत करना है |

मनु स्मृति श्लोक 8/371 का उपदेश है कि जो स्त्री अपनी जाति, गुण, घमंड से पति को छोड़कर व्यभिचार करे, उसको राजा बहुत स्त्री-पुरुषों के सामने जिंदा ही कुत्तों से कटवा कर राजा मरवा डालें | इसी प्रकार स्त्री को छोड़कर परस्त्री गमन करने वाले पापी को लोहे के पलंग को अग्नि से तपा, लाल करके उसपर सुला कर जिंदा ही उस पुरुष को पुरुषों के सामने भस्म कर देवे |

ऊपर लिखित कुछ एक मंत्र ही यह सिद्ध कर रहे हैं कि वैदिक संस्कृति पति द्वारा परस्त्री गमन और पत्नी द्वारा परपुरुष गमन को महापाप की संज्ञा देती है | तब यदि संपूर्ण चारों वेदों के मंत्रों को खोजा जाए तो इस विषय में अनंत ज्ञान प्राप्त होता है |

महाभारत युद्ध के पश्चात वेदाध्ययन में आई कमी, मनन-चिंतन तथा वैदिक शिक्षाओं को जीवन में धारण करने वाली प्रवृत्ति समाप्त होने के कारण, वैदिक धर्म लुप्त प्राय: हो गया और राक्षस वृत्ति, पाप युक्त कर्म तथा अंधविश्वास, अविद्या आदि का बोल-बाला हो गया |

वैदिक संस्कृति ने हमें यह सिखाया है कि हम वेदों में कहे कर्तव्यों का पालन करते रहें अर्थात वैदिक नियमों में बंधे रहे, नियमों का उल्लंघन न करें | इस कारण पति या पत्नी दोनों को धर्माचरण त्याग कर स्वतंत्र रहने देने की तो कल्पना भी नहीं की जा सकती | पर-पुरुष-पर स्त्री गमन करने का तो विचार तक मन में नहीं आ सकता | जहां राज्य संचालन के लिए वेदानुसार राजा वेद के ज्ञाता, ऋषि-मुनियों, विद्वानों से शिक्षा लेता था, अब राजा, सरकार, न्यायाधीशों आदि के स्वयं के बनाए नियम प्रजा पर थोपे जाते हैं, जो विद्वानों के विचारों से शून्य होते हैं | तब सुख कहां, प्रजा दु:ख ही दु:ख सहन करती है |

गुरु नानक जी के शब्दों में –
“नानक दुखिया सब संसार”